Moments Conserved
Sunday, 3 April 2011
Ehsaas
आवाजों के इस मंज़र में सागर की ख़ामोशी है ,
कौन जाने सागर की गहराई में भी मोती हैं ...
धरती के महके आँचल में कितनी कलियाँ सोती हैं ,
कुछ न कहती सिर्फ महकती हमको मद कर देती हैं...
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